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  • Ujjawal Trivedi

बच्चों को ज़हर बेचते OTT पर सेंसर की लगाम ज़रूरी : क्या यही है मनोरंजन का नया पैमाना


अगर कोई आपके घर में घुसकर आपके बच्चों को ज़हर देने की कोशिश करे तो आप क्या करेगे? कुछ ऐसा ही कर रहे है OTT पर बिना सेंसर करके रिलीज़ हो रहे वैब शो भी । चाहें वो पाताल लोक हो, Sacred Games हो या मिर्ज़ापुर । ये सारे शो बच्चे भी देखते है क्योकि इनको सेंसर नहीं किया जाता । ये तो आप भी मानेगे कि बचपन में देखे गए दृश्य और सुने गए वाक्य जीवन भर असर डालते हैं। अगर उम्र कच्ची हो तो बहुत सी बातें पूरी तरह समझ नहीं आती और यही आधा अधूरा ज्ञान घातक सिद्ध हो जाता है।


घर पर रहने वाले छोटी उम्र के बच्चे इन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाले वैब शो और फिल्मों को आसानी से एक स्विच पर क्लिक करके देख सकते हैं । यहां यह सोचना जरूरी है कि एक स्विच पर क्लिक करते ही हमारे समाज का बच्चा जिस तरह की भाषा और दृश्य देखने वाला है हम उसे पहले से ही सेंसर करना होगा जिससे उसकी मनोवृति पर कोई गलत प्रभाव ना पड़े।


क्या यही है मनोरंजन का नया पैमाना


क्या मनोरंजन इसे कहते है कि आपके बच्चे को वो सारी बाते जो बढती उम्र के साथ 19-20 साल का होने पर पता होनी चाहिये उन सवालों में वो दस बारह साल की उम्र में ही उलझने लगे? क्या आप चाहेगे कि बच्चे जिन्दगी की मासूमियत को छोड़कर गन्दी गालियों और अश्लील हरकते करने की practice करे? क्या यही है मनोरंजन का नया पैमाना ।


अगर इसका जवाब हां है तो इसे रोकने के लिये कदम भी आपको ही उठाना होगा। ज्यादातर बच्चे जैसा देखते है वैसा ही करते भी है। हम किसी भी कीमत पर अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते क्योंकि अगर हमने अभी से यह तय नहीं किया कि हमारे बच्चे किस तरह की बातें सुनेंगे, किस तरह के दृश्य देखेंगे, तो हो सकता है कि उनकी परवरिश पर गलत असर पड़े ।

बच्चे ही नहीं बड़ो पर भी असर


सिर्फ बच्चे ही क्यों यंहा तो असर बड़ो पर भी हो रहा है OTT (Over the top) पर रिलीज हो रहे शो और फिल्मों को लेकर विवाद बढ़ते जा रहे हैं । आमतौर पर लोगों के बीच होने वाली बातचीत में ओटीटी पर दिखाए जा रहे शो भी चर्चा का विषय बन चुके हैं । लोग अपने हाल चाल लेने के बाद आपस में यही बात करते दिखते है कि किस शो में क्या दिखाया जा रहा है ।


ऐसे में सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि इन ओटीटी प्लेटफॉर्म को सेंसरशिप से दूर ना रखा जाए। पिछले ढाई महीने से कोई भी फिल्म सिनेमा घर में रिलीज नहीं हुई है और आगे थियेटर्स कब खुलेंगे इसकी कोई तारीख भी तय नहीं है। हालत ये है कि फिल्में भी अब ओटीटी पर ही रिलीज हो रही हैं । जाहिर है इस मीडियम के दर्शक तेजी से बढ़े हैं और हमारे समाज पर इसका असर भी अब पहले से ज्यादा पड़ने लगा है।


बे-असर रही है सैल्फ सैंसरशिप


कई बार OTT पर self censorship की बातें की गई है पर उनका कोई असर नहीं दिखा यही वजह है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म पर पिछले 3 सालों में जिस तरह के शो प्रसारित हुए उनमें गालियों की भरमार है । जघन्य हत्याकांड दिखाये जाते है और इनमें कई ऐसे दृश्य भी शामिल होते हैं जिन्हें अगर कच्ची उम्र में देख लिया जाये या सुन लिया जाए तो वह घातक सिद्ध हो सकते हैं ।


इन दिनों पाताल लोक में दिखाए गए जातिसूचक शब्दों गालियों और उस पर हो रही राजनीति की चर्चाओं से पूरा सोशल मीडिया भरा पड़ा है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ओटीटी की लोकप्रियता कितनी बढी है टीवी पर दिखाए जाने वाले ये शो अगर पूरे देश भर के लोगों के बीच उनकी बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं तो अब अगली तैयारी भी करनी होगी हमें ओटीटी को सेंसर के दायरे में लाना होगा।


सेंसर की सीमाएं कैसी हो इस पर विचार किया जा सकता है । क्या सेंसर की सीमाएं फिल्मों की तरह रखी जाए या उनसे कुछ अलग हो इस पर भी विचार जरूर किया जाना चाहिए लेकिन किसी भी हालत में बिना सेंसर किया कोई भी शो पूरे परिवार के लिए ना परोसा जाए। इस देश में 130 करोड़ लोग रहते है जिसमें से करीब 30 करोड़ बच्चे है और हमें उनके बारे में अभी से सोचना होगा।

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