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  • Ujjawal Trivedi

एक कड़वा सच जिससे आपका भी है सरोकार





क्या आप जानते है कि जिन फिल्मों और टी वी शो को आप अपनी जेब से पैसा देकर देखते है उसमें काम करने वाले लोग अक्सर अपने मेहनताने के लिये महीनों का इंतज़ार करते है ?


ये लोग शो के लेखक, कैमरामैन, मेकअप या हेअर स्टाइलिस्ट, वीडियो ए़डिटर, फैशन डिज़ायनर, स्पॉट बॉय, तकनीशियन, सहायक निर्देशक जैसे लोग होते है जिनके बिना कोई भी शो या फिल्म नहीं बन सकती।


आपकी जेब से निकला पैसा इन लोगो तक पहुंचने में कई बार महीनों का वक्त लग जाता है।


ये सारे लोग भी हमारी तरह आम जनता है और इनको भी हर महीने का खर्च चलाना होता है पर इन्हे अपने काम का मेहनताना काम करने के कम से कम तीन महीने और कभी कभी तो 6 महीनो से भी लंबा इंतज़ार करने के बाद मिलता है ?


इनके बच्चो को हर महीने फीस देनी होती है और ये भी आप सभी की तरह हर महीने राशन, बिजली, घर का किराया सब कुछ देते है । इन लोगो की संख्या लाखों में है जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था में करो़ड़ो रूपये हर महीने का योगदान देते है फिर भी इनके हितो की सुरक्षा के लिये कोई इंतज़ाम नहीं है।


इन लोगो की सेवायें लेकर बनने वाली फिल्में हज़ारो करोड़ रूपयो का व्यवसाय करती है फिर भी इनको इनके हक के लिये हर बार लड़ना होता है। ये वो कड़वा सच है जिसे आप सभी को जानना ज़रूरी है।


भारतीय फिल्म उद्योग में करीब 80 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग ऐसे हैं जो बतौर फ्रीलांसर काम करते हैं । मतलब ये कि भारतीय फिल्म उद्योग से देश को होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा इन्ही फ्रीलांसर (पेशेवर) लोगों की आय से आता है। देश को मिलने वाले हज़ारो करोड़ रूपयो का राजस्व इन्ही लोगो की आमदनी पर निर्भर है फिर भी सरकार ने इस समस्या पर कभी ध्यान नही दिया कि अगर इन लोगो के साथ अन्याय होता है या इन्हे इनका मेहनताना नहीं मिलता/देरी से मिलता है तो इस तरह की समस्या के लिये ये किसके दर पर जायें।


मनोरंजन जगत में क्या है चलन

मनोरंजन उद्योग में जिसमे (टी वी, डिजिटल, रेडियो और फिल्में ) सभी शामिल है काम करने वाले फ्रीलांसर पेशेवर लोगो को काम करने के तीन महीने बाद मेहनतानें का भुगतान किया जाता है और कभी कभी ये समय 6 महीने तक भी चला जाता है। आज के हालात में जब दो महीने से काम रूका हुआ है इनकी परेशानी और भी बढ़ चुकी है क्योकि ज्यादातर लोगो ने जो जनवरी 2020 के महीने में भी काम किया था उसका पैसा उन्हे अभी तक नहीं मिला है। आगे काम कब शुरू होगा इसका भी कोई निश्चित ठिकाना नहीं है।


भारत सरकार ने इन पेशेवर लोगों के लिए ऐसी कोई अदालत नहीं बनाई है जहां यह अपने साथ हो रहे अत्याचार के बारे में शिकायत कर सकें। अगर कोई इनको इनके काम का दिया मेहनताना देने में बहुत देरी होती है तो इनके पास सिवाय अपनी रजिस्टर्ड एसोसिएशन के पास जाने के और कोई चारा नहीं होता ।


क्यों नहीं मिलता न्याय


देश में कानून है कि कोई भी सात लोग मिलकर एसोसिएशन बना सकते है पर इनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होता । फिल्म उद्योग में कई तरह की एसोसिएशन है और अलग-अलग तरह के पेशे से जुड़े लोग जैसे स्क्रिप्ट लेखक, मेकअप आर्टिस्ट, अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, लाइटमैन, स्पॉटबॉय, जूनियर आर्टिस्ट. यह सब अलग-अलग बिखरे हुए हैं । सब अपने साथ हो रहे अत्याचार या सही मेहनताना ना मिलने की शिकायत अपनी-अपनी एसोसिएशन में करते हैं पर कोई स्थायी उपाय नहीं मिलता क्योंकि अत्याचार होते रहते हैं। कभी पैसे का वक्त पर ना मिलना, कभी पूरे पैसे का ना मिलना, कभी काम के घंटों का ज्यादा होना और कभी पैसे देने से मुकर जाना ।


यह आमतौर पर होने वाले अत्याचार हैं जो इनके साथ होते रहते हैं । आज जरूरत इस बात की है कि यह सारी अलग-अलग बनी एसोसिएशन एक साथ आकर एक छतरी के नीचे खड़ी हो जाये और यह सब मिलकर किसी एक के साथ हो रहे अत्याचार के लिए न्याय मांगे ऐसा करने पर ही सही इलाज मिल पाएगा ।


आसान है उपाय


अगर कोई अभिनेता किसी निर्माता के सेट पर यह कहकर जाने से इंकार कर देता है कि तुम्हारे सेट पर जो कैमरामैन या लाइट मैन के साथ अत्याचार हुआ है जो उसके जो पैसे नहीं दिए गए हैं वह पहले निबटाये जाये तभी मैं शूटिंग करूंगा । जब तक अलग अलग पेशे के लोग एकजुट होकर एक दूसरे के लिये न्याय नहीं मांगेगे न्याय नहीं मिलेगा।

सबको सबसे जुड़ना होगा क्योकि सबका काम एक दूसरे से जुड़ा हुआ है जब तक इस भाव के साथ जुड़ना नहीं होगा तब तक इलाज नहीं होगा। एकता में ही शक्ति है यह हमने बहुत पहले से सुना है लेकिन अब जरूरत है इसे आज़माने की । साथ खड़े होकर एक साथ आवाज लगाने की ।


देश के बाकी उद्योगो के फ्रीलांसर (पेशेवर) भी साथ आयें


सिर्फ भारतीय फिल्म उद्योग ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न उद्योगों में कार्यरत फ्रीलांसर पेशेवर लोगों को इसी तरह एक छतरी के नीचे खड़े होकर न्याय मांगना होगा तभी इनको न्याय मिलेगा । देश के एक चौथाई से ज्यादा लोग पेशेवर फ्रीलांसर की श्रेणी में आते है। अगर देश की अर्थव्यवस्था में इनका करीब 400 बिलियन रूपयों का हिस्सा है तो इनके बारे में सोचना बहुत ज़रूरी हो जाता है।


सरकार को दोषी ठहरा देने से मुश्किलें हल नहीं हो जाती सरकार अगर दोषी है तो हमें भी सही कदम उठाने होंगे और कुछ ऐसा करना होगा जिससे इस बात की जरूरत महसूस हो कि फ्रीलांसर पेशेवर लोगों के साथ इस तरह का न्याय नहीं किया जा सकता जब तक आवाज में असर नहीं होगा किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा और आवाज में असर लाने के लिए सबको साथ खड़े होना होगा


मेरी मित्र सुलगना चटर्जी जो पेशे से एक्टर है और इन दिनो बॉलीवुड के पेशेवर लोगो को न्याय दिलाने के लिये एक मुहिम लड़ रही है इसमें शामिल होने और उनकी आवाज़ बुलन्द करने के लिये नीचे दिये गये लिंक को क्लिक करें और इनके साथ हो रहे अन्याय से लड़नें में इनकी मदद करे।


http://chng.it/nZPrPwhT


हाल ही में सुलगना चटर्जी नें एक वीडियो भी पोस्ट किया है जिसमें उन्होने अपनी यही शिकायत ज़ोर शोर से कही है आप नीचे दिये लिंक को क्लिक करके देख सकते है।


https://www.instagram.com/tv/B_ueiWnJw8S/?igshid=1twnjdbrsudyg







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